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Monday, May 29, 2017
Thursday, April 20, 2017
SSC CHSL 2017 में Select होना है तो इस Mock Test को ज़रूर देखिये । हिंदी में । 25 Questions
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Tuesday, April 11, 2017
पढ़ने के लिए चाहिए निजी स्कूल कॉलेज और नौकरी सरकारी,आखिर ऐसा क्यों?जानिए जरूर इस शिक्षा व्यवस्था को।
सरकारी विद्यालय देश के हर राज्य और ज़िला में हैं।साथ ही इसकी स्तिथि क्या हैं?इस बात से भी सभी अवगत हैं।भले ही गरीब बच्चों को शिक्षा तो मिल जाती हैं।पर,शिक्षा व्यवस्था का क्या हाल हैं?यह भी किसी से छुपी नहीं हैं।किसी भी विद्यालय को ले ले।सभी में कुछ न कुछ कमियों की भरमार हैं।खाने के लिए खिचड़ी,पढ़ने के लिए किताबें, बैठने के लिए टेबल आदि सुविधाएं धीरे-धीरे मिल रही हैं।पर,शिक्षा व्यवस्था पर कोई खास असरदार बदलाव देखने को नहीं मिल पा रहा हैं।शिक्षकों की कमी भी हर विद्यालय में खलती हैं।यूँ कहे कि जब कोई पढ़ना चाहता हैं।तो,निजी स्कूल कॉलेज की ख्वाहिश रखता हैं।लेकिन,जब कोई नौकरी की इच्छा रखता हैं।तो,सरकारी नौकरी के लिए ज़्यादा प्रयास करता हैं।इसी बात से समझ में आता हैं कि निजी स्कूल और सरकारी स्कूल में क्या अंतर हैं?साथ ही यह भी पता चलता हैं कि सरकारी नौकरी और निजी नौकरी में क्या अंतर हैं?
अगर सरकारी और निजी स्कूलों की बात करें।तो,सरकारी स्कूल से मुफ्त में बहुत कुछ मिलता हैं।परंतु,सही शिक्षा नहीं मिलती हैं।इसी तरह सरकारी और निजी नौकरी की बात करें।तो,निजी नौकरी में सुविधा कम मेहनत ज़्यादा हैं।जबकि,सरकारी नौकरी में मेहनत कम सुविधा ज़्यादा हैं।हमारे भारत देश में इस प्रकार की मानसिकता बहुत पुरानी हैं।सरकार कई बदलाव लाती हैं और लाना चाहती भी हैं।पर,हर विभाग में कोई न कोई कमी हैं।
वर्तमान में निजी स्कूलों की संख्या में इज़ाफ़ा हुआ हैं ।वहीं सरकारी नौकरियों में कमी आयी हैं।युवाओं में बेरोजगारी भी बढ़ी हैं।कारण इसका एक ही शिक्षा व्यवस्था।क्योंकि,आम तौर पर जो युवा सरकारी स्कूल कॉलेज में पढ़कर आ रहें हैं।उन्हें आगे प्रतियोगी परीक्षाओं में ज़्यादा दिक्कतें हो रही हैं।निजी स्कूल कॉलेज फल फूल रहें हैं।हर साल मनमाना पैसा वसूल रहें हैं।कई कोचिंग संस्थान भी अब गाढ़ी कमाई कर रहें हैं।इन सबके बीच गरीब तबके के शिक्षित युवा भीड़ में गुम हो रहें हैं।
सरकार को अगर सच मे सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाना हैं।तो,सभी सरकारी अधिकारी के बच्चों का सरकारी स्कूल कॉलेज में पढ़ना अनिवार्य कर देना चाहिए।इसके साथ ही जो भी निजी स्कूल कॉलेज हैं।उन सब के लिए एक सख्त कानून बनाई जानी चाहिए।क्योंकि,इन निजी स्कूल कॉलेज की वजह से ही शिक्षा एक बड़ा व्यवसाय बनता जा रहा हैं।
Monday, April 10, 2017
निजी स्कूलों के शिक्षा के दुकान के जरिये हो रही अवैध वसूली के खिलाफ सख्त कानून होना चाहिए।
लगभग सौ वर्ष पूर्व भारतवर्ष में सन 1993 में गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा प्रत्येक बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार बिल पारित किया गया था। लेकिन, भारतवर्ष की आजादी के बाद भी उसमें अधिक सुधार नहीं आ सका हैं।वर्तमान दौर में हमारे देश में हर वर्ष लाखों बच्चे शिक्षा के अधिकार से वंचित रह जाते हैं। उसमेें अभिभावकों की लापरवाही होती हैं।या फिर स्कूल संचालकों की मनमानी भी हो सकती हैं।निजी स्कूलों में मनमाने तरीके से अधिक फीस होने के कारण अभिभावकों की मजबूरी भी हो सकती है। क्योंकि निजी स्कूलों के संचालक तो खुद ही अपने नियम बनाकर शिक्षा के नाम पर अवैध वसूली कर रहे हैं। निजी स्कूल संचालक बुकसेलरों से बिकने वाले स्कूल कोर्सों पर चलाये जा रहे किताब कॉपियों से 50-60 प्रतिशित तक कमीशन ले लेते हैं।
सरकारी स्कूलों के ढुलमुल रवैये और गैर सरकारी स्कूलों की मनमानी फीस वसूली के कारण सैकड़ों बच्चे शिक्षा के अधिकार से वंचित है। भारत के सभी राज्यों में जहाँ एक तरफ प्राईवेट स्कूल संचालकों की मनमानी व फीस के नाम पर अवैध वसूली से अभिभावक त्रस्त हैं तो वहीं सरकारी विद्यालयों के अध्यापक/अध्यापिकायें स्कलू में समय से पहुँचकर बच्चों केा शिक्षा देने के बजाय अपनी-अपनी आस्तीनें चढ़ाकर सरकारी कार्यालयों पर नेतागीरी कर रहे हैं ।तो कुछेक स्कूल में तो हाजिरी लगाने के बाद शिक्षक रफू चक्कर हो जाते है। निरंकुश निजी स्कूल संचालकों ने अपने स्वयं के नियम बनाकर विद्यालयों को शिक्षा की दुकान बनाकर अवैध वसूली करना शुरू कर दिया है। ये निजी संचालक अभिभावकों से स्कूल में हर तरह की सुविधाओं का वादा करके उनकी जेब को हल्का कर रहे हैं। सभी निजी स्कूलों द्वारा अपने स्कूल के कोर्स भी एक निश्चित बुकसेलर पर ही बिकवाये जाते हैं और उस कोर्स पर 50 से 60 प्रतिशित तक कमीशन खुद ही लेते हैं। ऐसे माहौल में गरीब तबके का अभिभावक अपने बच्चों केा उचित शिक्षा कैसे दिलाये?कई अभिभावक का कहना है कि उन्होंने सरकारी स्कूल में अपने बच्चे केा भेजा तो वहाॅ तो केवल भोजन के अलावा कुछ नहीं है और इसके अलावा प्राईवेट स्कूलों में भेजने के लिए उनके पास पर्याप्त धन नहीं है। ऐसी स्थिति में उन्होंने अपने आठ वर्षीय पुत्र को एक मोटर मिस्त्री के यहाॅ पर काम पर रख दिया है। यही कारण हैं कि हर चाय की दुकान से लेकर ढाबा एवं किराना आदि की दुकानों पर कई बच्चे काम करते हुए मिल जायेगा।पूरे भारत मे निजी स्कूलों के खिलाफ हर राज्य में सख्त कानून बनना चाहिए।साथ ही नियमों का पालन भी सख्ती से होना चाहिए।
Sunday, April 9, 2017
आरटीई (राइट टू एजुकेशन) अर्थात शिक्षा का अधिकार क्या हैं?जरूर जानिए,जरूरी हैं।
आरटीई राइट टू एजुकेशन अर्थात शिक्षा का अधिकार क्या हैं?अगर,आप नहीं जानते हैं।तो ,जरूर जानें।
अगर कोई भी स्कूल अनुच्छेद 21 (क) और आरटीई अधिनियम 01 अप्रैल 2010 का पालन नहीं करता है.तो उस स्कूल के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही की जा सकती हैं.इसके अलावे यदि कोई गैर सरकारी स्कूल 25 प्रतिशित सीटें गरीब परिवार के बच्चों के लिए मुहैया नहीं करवाता है।तो,उसके खिलाफ शिकायत होने पर उसकी मान्यता निरस्त की जा सकती है अथवा 25 हजार से 50 हजार रुपये तक का जुर्माना भी हो सकता है।
और भी हैं शिक्षा से जुड़ें स्कूलों के मानक.
सभी स्कूलों में शिक्षित-प्रशिक्षित अध्यापक/अध्यापिकायें होने चाहिए और अध्यापक-छात्र का अनुपात 1:30 होना चाहिए। इसके अलावा स्कूलों में मूलभूत सुविधायें जैसे- हवादार कक्ष, खेल का पर्याप्त मैदान, पीने का स्वच्छ पानी, पुस्तकालय आदि की अनिवार्य रूप से व्यवस्था होनी चाहिए। स्कूल की इमारत भी मानकों के अनुरूप ही बनी होनी चाहिए, जिससे कि आये दिन स्कूलों की इमारतें गिरने वाली घटनायें न हो सकें। इसके अलावा स्कूल परिसर के आसपास या अन्दर बीड़ी, सिगरेट, गुटका,खैनी आदि जैसी नशीले चीजों को बेचना भी गैरकानूनी हैं।