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Saturday, April 8, 2017

हर बेसहारा जरूरतमंद की संभावित मदद करें,हो सकता हैं आपकी एक मदद कितनों की ज़िंदगी बदल दे।

किसी सड़क के किनारे एक बच्ची बैठी रो रही थी।उसके पास एक टिफ़िन बॉक्स खाली थी।उसके पास कुछ भी खाने को नहीं था।इस कारण वह बच्ची रो रही थी।पास में ही एक रेस्टोरेंट था।कुछ देर बाद एक कार आयी।जो ठीक उस रेस्टोरेंट के पास आकर रुकी।वो बच्ची अब भी वही बैठी थी।कार से कुछ लोग बाहर निकलें।उसमे एक छोटा लड़का भी था।वह बच्ची लड़की चुपचाप  बैठी हुई थी।कार में आया छोटा लड़का बार बार  उस छोटी लड़की को देख रहा था।थोड़ी देर में सभी रेस्टोरेंट के अंदर चलें गए।छोटी लड़की बाहर से ही सबकुछ देख रहीं थी।रेस्टोरेंट के अंदर बहुत भीड़ थी।उस बच्चें का जन्मदिन सभी मना रहे थे।सभी ने बड़े मजे से केक खाया और उस बच्चे को ढेर सारे उपहार भी मिलें।कुछ देर बाद पार्टी खत्म हुई।सभी एक एक करके बाहर आ रहें थे।वह छोटा बच्चा भी बाहर आया।उसने सड़क के किनारे बैठी छोटी बच्ची को केक और एक उपहार का डब्बा दिया।जिस डिब्बे पर लिखा था-बहुत बहुत शुभकामना के साथ।उस बच्ची ने केक खाई और डिब्बे को टोकरी में भरकर चली गयी।अगले दिन से वह लड़की उसी तरह के डिब्बे बना कर स्कूल कॉलेज पार्क आदि जगहों पर हर बच्चे बच्चियों को बेचा करती थी।10 साल बाद वह लड़का अपनी पत्नी औऱ बच्चों के साथ एक महिला के दुकान में आई।वहाँ पर सभी बच्चों के लिए मुफ्त में हर रोज़ उपहार का डब्बा दिया जाता था।हर डब्बे में कुछ अलग अलग चीजे मिलती थी।यह दुकान उसी बच्ची की हैं।जो कल तक सड़क पर मदद के लिए खड़ी थी।पर,आज यह खुद कई बच्चे बच्चियों के लिए सहारा बनी हुई हैं।उस व्यक्ति को यह जान कर काफी हैरानी हुई कि यह वही बच्ची हैं।
तो,दोस्तों आज अगर आप किसी बेसहारा और जरूरतमंद की मदद करते हो।तो, हो सकता हैं।कल आपकी भी कोई मदद करें या आपके एक मदद से कई ज़िन्दगी बदल जाये।

Sunday, March 12, 2017

पलाश के फूल एक लघुकथा

पलाश के फूल जो झारखण्ड का राजकीय पुष्प हैं।शायद ही कोई ऐसा होगा,जो इसकी सुंदरता से मोहित नहीं होता हैं।हर किसी का मन स्वयं ही खिले पलाश के पुष्प को देखकर मोहित हो ही जाता हैं।लेकिन,इसके पीछे छिपे एक ऐतिहासिक लोक कथा को शायद ही कोई जानता हो।दरअसल बात कुछ ऐसी हैं।एक बहुत ही खूबसूरत राजकुमारी हुआ करती थी।एक दिन राजकुमारी अपने सहेलियों संग जंगल आखेट के लिए गयी।बहुत देर तक जंगल में शिकार करते हुए अचानक राजकुमारी को प्यास लगी।वह अपनी प्यास बुझाने सहेलियों संग जंगल में एक झील के किनारे गये।वहाँ राजकुमारी को एक युवक से प्यार हो गया।वह युवक बिल्कुल राजकुमार सा दिखता था।उसे देखते ही राजकुमारी ऐसे महसूस करने लगी।मानो वह दोनों एक दूसरें को पहले से जानते हो।दोनों के बीच प्यार का आकर्षण बढ़ता गया।लेकिन,दोनों एक न हो सके।किसी दिन अचानक वह युवक गायब हो गया या कहीं चला गया।राजकुमारी पागलों की तरह संपूर्ण जंगल में इधर उधर उस युवक को खोजती रहीं।मगर वह युवक न मिला।जंगल झाड़ नंगे पाँव राजकुमारी विरह वेदना में ढूंढती रही।राजकुमारी के आँखों से आँसू गिर रही थी।उसके हृदय से बस उस युवक के लिए ही पुकार निकल रही थी।कहते हैं कि राजकुमारी के आँसू जहाँ जहाँ गिरें।उन सभी जगहों में पलाश के पेड़ उग गये।जब भी हर वर्ष वसंत का मौसम आता हैं।पेड़ के सारे पत्ते झड़ जाते हैं।फिर पलाश के पेड़ राजकुमारी के आंसुओं से बने लाल पुष्प से लद जाते हैं।शायद जो गया हैं,वह वापस लौट आये और जिससे राजकुमारी की आत्मा को शांति प्राप्त हो।

Sunday, February 5, 2017

अधूरे सपने-समाज की वास्तविकता

शीर्षक:-अधूरे सपने 
लेखक:-युधिष्ठिर महतो(कुमार यूडी)  
साहेब और मुकेश कचड़ा उठाने का करते है|मुकेश के नाना नानी फ़िरोज़ाबाद में रहते हैं|वे लोग चूड़ी बनाने का काम करते हैं|मुकेश बड़ा होकर मैकेनिक बनना चाहता हैं|साहेब भी एक पायलेट बनना चाहता हैं|दोनों के माता पिता बहुत ही गरीब होने के कारन कोई भी अपना सपना पूरा नही कर पाता हैं|मुकेश अपने जिस काम में था|वह वही करता हैं|साहेब कूड़ा कचड़ा का काम छोड़ कर होटल में काम करने लगता हैं|दोनो दोस्त सड़क के फुटपाथ पर बैठकर बातें कर रहे है|   
साहेब:-मुकेश अब तू फ़िरोज़ाबाद जा रहा हैं|क्या तू फिर कभी नहीं आएगा|        
  मुकेश:-अरे,नहीं देख मैं बड़ा होकर मैकेनीक बनना चाहता हूँ|पर मेरे पास पैसे कहाँ हैं|इसलिए अपने नाना नानी के पास जा रहा हूँ|            साहेब:-अच्छा हर महीने कॉल जरूर करना |     मुकेश:-जरूर करूँगा |वैसे तू भी तो पायलेट बनना चाहता हैं|जब तू पायलेट बनेगा |तो मुझे मेकेनिक रख लेना|               
साहेब:-ठीक हैं तेरी ट्रैन कितने बजे हैं?     मुकेश:-शाम को हैं|      
साहेब:-प्रिया से मिल लेना|वो भी तुम्हें बहुत याद करेगी|  
मुकेश:-अच्छा याद दिलाया |लेकिन,उसका घर भी तो बहुत दूर हैं|  
साहेब:-मिलेगा तो उसे अच्छा लगेगा |   मुकेश:-एक काम कर मैं तुम्हे एक चिट्ठी लिख  देता हूँ|उसे दे देना|             
साहेब:-ठीक हैं मैं उसे देदे दूँगा|    
मुकेश फ़िरोज़ाबाद चल जाता हैं|वहां पहुंचकर मुकेश भी चूड़ी बनाने का काम करने लगता हैं|प्रिया और साहेब रोज़ाना कचड़ा उठाने का काम किया करते हैं|साथ ही हर महीने मुकेश के कॉल का इंतज़ार किया करते हैं| यूँ ही कई महीने बीत जाते हैं|एक दिन मुकेश का कॉल आता हैं|प्रिया और साहेब कचड़े के ढ़ेर में कुछ खोज रहे हैं|तभी सामने से दूकान वाला साहेब को बुलाता हैं|  दूकानवाला:-साहेब मुकेश का फ़ोन आया हैं|  साहेब और प्रिया दौड़े दौड़ आते हैं।
साहेब:-हेलो,मुकेश कैसा हैं रे?इतने दिनों बाद हमारी याद आयी।
मुकेश:-ऐसा नहीं हैं।समय ही नहीं मिल पा रहा था।
साहेब:-अच्छा अब तू बड़ा आदमी हो गया हैं।
मुकेश:-अच्छा बाबा माफ़ी माँगता हूँ।अब खुश।
साहेब:-ठीक हैं।मैंने माफ़ किया।पर प्रिया बहुत नाराज हैं।तू जाते समय मिला भी नहीं।और अभी इतने दिनों बाद कॉल कर रहा हैं।
मुकेश:-कैसी हैं?
साहेब:-बहुत गुस्से में हैं।ले बात कर।
प्रिया साहेब से फ़ोन लेती हैं।
प्रिया:-हाँ हेलो।वहाँ जाते ही हमे भूल गए।
मुकेश:-अरे पगली,तुमलोगो को कैसे भूल सकता हूँ?तुम लोग ही मेरे सच्चे साथी हो।
प्रिया:-वापस कब आ रहे हो?
मुकेश:-पता नहीं आ पाउँगा या नही।सोचा था।यहाँ आकर पढाई भी करूँगा।लेकिन,बहुत मुश्किल हैं।शायद हमारे किस्मत में गरीबी ही हैं।
प्रिया:-तो क्या तुम नहीं आओगे।
मुकेश:-देखते हैं।आगे जो संभव हो।
प्रिया:-ठीक हैं।तब रखती हूं।
कॉल कट करके फ़ोन रख देता हैं।साहेब और प्रिया अपने अपने काम में जुट जातें हैं।