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Friday, April 14, 2017

मेरे जुनून ने ही मुझे अभियंता से अभिनेता बनाया-अमरनाथ कुमार

झारखंड संगीत फ़िल्म संसार धीरे धीरे विकसित हो रहा हैं।कलाकारों की सक्रियता हमेशा से रही हैं।अमरनाथ भी उन्हीं युवा कलाकारों में से एक हैं।स्कूल और कॉलेज के दिनों से ही नाटक में रुचि रही।कई नाटकों में स्कूल के दिनों में ही अभिनय किया।पर, उस समय अधिकतर ध्यान पढ़ाई की तरफ ही ज़्यादा रहा।समय के अनुसार बदलाव आता गया।जब पढ़ाई लिखाई पूरी हुई।तो,फिर नौकरी करने लगे।लेकिन,एक बात अमरनाथ के मन हमेशा से असंतोषजनक बनी रही।वह थी अभिनय के प्रति रुझान।जैसे जैसे बड़े हुए पढ़ाई लिखाई के साथ साथ अभिनय के तरफ भी आकर्षण बढ़ता गया।जब तक हो सकता था नौकरी करते रहें।लेकिन,जब मन और नहीं माना तो नौकरी छोड़ पूरी तरह से अभिनय से जुड़ गए।शुरुआत नाटकों से हुई।असगर वज़ाहत द्वारा लिखित व संजय लाल द्वारा निर्देशित लोकप्रिय नाटक "जिस लाहौर नई देखया वो जम्याई नई"से नाटकों की दुनिया में शुरुआत की।इस नाटक की सफलता का पता इसी बात से चलता हैं कि इस नाटक के बाद कई अन्य राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय नाटकों में अमरनाथ को काम करने का मौका मिला।इसके बाद तो फिर एक्सपोज़र नाट्य संस्था से जुड़े।कई लोकप्रिय नाटकों जैसे काल कोठरी,अभिज्ञान शांकुतलम,कैनवस की मौत,शिव गाथा,कुर्बानी बेकार नहीं जाएगी आदि में काम किया।इसके अलावे कई बॉलीवुड फिल्मो में छोटे छोटे रोल में काम भी किया हैं।जिनमें से अजब सिंह की गजब कहानी एक हैं।बाकी अन्य फिल्मे प्रोसेस में लगी हैं।जो जल्द ही रिलीज की जाएगी।अपने करियर से जुड़ी बातचीत के बाद अमरनाथ ने झारखंड में संभावित फ़िल्म निर्माण के विकास के बारे में भी बात कही।इनका कहना की झारखंड में कई संभावनाएं हैं।यहाँ का लोकेशन प्राकृतिक रूप से ही इतना सुंदर हैं कि हर कोई यहाँ फ़िल्म की शूटिंग करता ही हैं।युवा वर्ग जो अभी फिल्मों में काम करना चाहते हैं।वे पहले बारीकी से सीखें।क्योंकि सीखे रहने से आप कही भी आसानी से काम कर सकते हो।

Friday, February 24, 2017

झारखण्ड के उभरते कलाकार हैं भरत महतो

भरत महतो सदरियाडीह धनबाद से हैं।लेकिन,मुम्बई में छोटे -छोटे काम के जरिये अपने अभिनय से एक अलग पहचान बनाई हैं।बचपन से ही पढ़ने-लिखने के अलावे नाटक में रूचि थी।स्कूल कॉलेज में भाग भी लिया करते थे।परिवार में अपने चार भाई बहनों में बड़े हैं।जब बहन की शादी हुई।उसके बाद अपने पिता से बात करके मल्टीमीडिया के लिए करने की इच्छा जाहिर की।पर,उस समय तुरंत संभव नहीं था।लिहाज़ा,धनबाद में रहकर ही अपनी पढाई जारी रखते रहें।भरत ने आखिरकार ज़िद करके यह मन बना लिया कि अब वह भी मुम्बई जायेगा।एमसीए करने के बाद जो कुछ भी थोड़ा पैसा बचा के रखे थे।वह लेकर और अपनी बहन से भी कुछ पैसे लेकर मुम्बई अपने दोस्त के पास चले आते हैं।मुम्बई में फिशरीज कंपनी में काम करते रहें।फिर एक दिन अपने मेनेजर से एडवांस लेकर मल्टीमीडिया करने लगे।रात 9 बजे से सुबह 9 बजे तक काम किया करते थे।सुबह पढाई किया करते थे।इस तरह यहाँ वहाँ करते-करते मल्टीमीडिया कम्पलीट किये।इसके बाद थिएटर ज्वाइन कर लिए।स्मिता पाटिल स्ट्रीट थिएटर से जुड़कर कई शॉर्ट फिल्म्स और टीवी सीरियल में काम करते रहें।कॉमेडी क्लासेस, अकबर बीरबल,जय हनुमान,सिया के राम आदि सीरियल के अलावे कई मराठी सीरियल में भी काम करते गये।भरत अभिनय के क्षेत्र में सक्रिय हैं और कुछ हिंदी फिल्म में भी काम चल ही रहा हैं।

Monday, January 16, 2017

कलाकारों के एकता में ही झारखण्ड के फिल्म संगीत का विकास संभव हैं-गुड्डू जान

गुड्डू जान संगीत और फिल्म के क्षेत्र में एक ऐसा नाम जिन्होंने झारखण्ड फिल्म संगीत की दुनिया में एक गायक,गीतकार के रूप में अपने आप को स्थापित किये हैं।इतने सालों तक काम करने के बाद अब निर्देशन भी कर रहे हैं।इनके परिवार का माहौल शुरू से ही संगीतमय रहा हैं।इनके पिता जी स्व. श्री रासु लाल दास झूमर गायक रहे हैं।साथ ही इनके भाई भी माणिक लाल दास खोरठा गायक रहें हैं।जब गुड्डू जान की उम्र 13-14 वर्ष की थी।तभी इनके बड़े भाई खोरठा एल्बम बनाया करते थे।इस वजह से गुड्डू जान को संगीत विरासत में मिली।अपने पिता और बड़े भाई से ही इन्होंने बहुत कुछ सीखा।पारिवारिक दायित्व सँभालने से पहले ही इनके माता-पिता का देहान्त हो गया।कई नौकरियों का अवसर भी मिला।लेकिन,नौकरी न करके इन्होंने संगीत के क्षेत्र में ही काम करने की सोची।इनका पहला म्यूजिक एल्बम जान लवली म्यूजिक के द्वारा रिलीज़ किया गया था।इसके बाद मेगा म्यूजिक से कई एल्बम रिलीज़ हुए।मनमोहिनी,जान,सनम,प्यार के बंदन आदि कुछ सुपरहिट एल्बम हैं।अभी तक इन्होंने दर्जनों म्यूजिक एल्बम और 500 से भी ज़्यादा स्टेज शोज पुरे झारखण्ड बिहार बंगाल में कर चुके हैं।इनके बड़े भाई और पप्पू गुप्ता  का काफी सहयोग रहा।खोरठा भाषा गीत संगीत का क्षेत्र पुरे भारत में हैं।लोगो की धारन गलत हैं।अगर खोरठा भाषा में भी अच्छे काम हो।तो खोरठा भाषा को भी राष्ट्रीय पहचान मिलेगी।इनकी पहली खोरठा फिल्म साजन थी।इसके बाद अभी कई आने वाली फिल्मों में काम चल रहा हैं।अभी हाल ही में माटी खोरठा फिल्म बनी।जिसके मुख्य कलाकार रमन गुप्ता,वर्षा ऋतु,वृज गोपाल,मोनिका मुंडु हैं।इस फिल्म में गीत मिलन व् गुड्डू जान ने लिखे हैं।इस फिल्म के गीतों को ज्योति साहू ने गायी हैं।झारखण्ड के कलाकारों में ज्ञान की बहुत कमी हैं।इसलिए सबसे पहले सीखे।जहाँ फिल्म का बाज़ार है।जहाँ फिल्म नगरी हैं।इन जगहों से अनुभव लेकर ही काम करें।बिना कुछ जानें या आधा अधूरा ज्ञान से कभी भी एक बेहतर फिल्म नहीं बनाई जा सकती हैं।झारखण्ड फिल्म तकनिकी सलाहकार समिति के बारे में इन्होंने कहा कि यह सरकार की एक अच्छी पहल हैं।कुछ लोग समर्थन कर रहे हैं।तो कुछ लोग विरोध भी कर रहे हैं।लेकिन,यह एक अच्छा काम हैं।सरकार ने जो भी कदम उठाया हैं।जो भी सुविधा फ़िलहाल मिल रही हैं।उसका लाभ उठाना चाहिए।बाकी बाद में जो कमी लगेगी।वह तो सलाह मशवरा से बदली जा सकती हैं।पर पहले बढ़िया काम करने में ध्यान दे।क्षेत्रीय कलाकार मिलकर एक कमिटी बना सकते हैं।जो यहाँ के टीवी चैनल,सिनेमाहॉल हैं।हर जगह आपस में बात कर के ही आगे की रणनीति बनाई जा सकती हैं।बशर्ते काम सही ढंग से हो।आज के युवा कलाकार साथ एकता बनाकर आगे बढ़े।ज़्यादा से ज़्यादा सीखकर सभी साथ मिलकर काम करें।तभी बेहतर काम होगा।झारखण्ड में भी फिल्म उद्योग का विकास होगा।संगीत और फिल्म तो गुड्डू जान के लिए ठीक वैसा ही हैं।जैसा उनका नाम।

Friday, January 13, 2017

अभिनय करने से मुझे एक अलग ही मजा आता हैं-अमित कुमार खत्री

""अभिनय मेरे मानसिक तनाव को कम करती हैं और उम्र को बढ़ाती हैं-अमित कुमार खत्री""स्कूल और कॉलेज के दिनों से ही अमित कुमार खत्री काफी चर्चित रहें हैं।कोई भी कार्यक्रम हुआ करता था।तो इनका अभिनय काफी पसंद किया जाता था।बोकारो में अपनी पढाई लिखाई पूरी करने के बाद धनबाद आये।जब इन्होंने कई म्यूजिकल ग्रुप से जुड़कर काम करना चाहा।तो किसी भी म्यूजिकल ग्रुप ने महत्व नहीं दिया।तब इन्होंने एंकर के रूप में शुरुआत की।धीरे धीरे कई नाटक भी करने लगे।नुक्कड़ नाटक नया जीवन के लिए  इन्हें टाउन हॉल में सम्मानित भी किया गया।अभिनय के अलावे इन्होंने जादूगर के रूप में भी अपनी पहचान बनाई हैं।मशहूर जादूगर एस कुमार से इन्होंने जादूगर की शिक्षा ली।इसके बाद कई शाहरों में कार्यक्रम भी किये।इसी तरह काम करते करते इनकी मुलाकात विश्व प्रसिद्ध जादूगर ओपी शर्मा से हुई।इनके सहयोगी के रूप में भी अमित ने काफी सालों तक किये।जिसके लिए इन्हें सम्मानित भी किया गया।इस तरह से काम बढ़ता रहा।फिर शुरू हुआ इनका फ़िल्मी सफर।झारखंडी हीरो से फिल्मों में अभिनय की शुरुआत हुई।इसके बाद पतन,भारत माँ के लाल,जूरी हिजुआ,द लायन आदि फिल्मों में अभिनय किये।आने वाले कई और भी काम जारी हैं।इतनी दूर आज आने के बाद भी संघर्ष का दौर जारी हैं।जब कभी अपने बीते दिनों की बात करते हैं।तो आज भी अमित जी काफी भावुक हो जाते हैं।शुरुआत के दिनों में इन्होंने काफी आर्थिक समस्या झेली।मानसिक तनाव भी काफी रहा।लेकिन,इनकी एक खासियत हमेशा से रही हैं कि ये कभी भी एक ही काम को लेकर नहीं रहे।हमेशा जो भी काम मिला।सीखते गये और करते गये।इसी वजह से आज तक बने रहे हैं।झारखण्ड में फिल्म और संगीत के माहौल को लेकर इनकी सोच काफी दुःखद हैं।क्योंकि,झारखण्ड में कई फिल्में बनती हैं।पर,उनमे से रिलीज़ बहुत कम होती हैं।यहाँ कलाकार भी सीखें हुए नहीं हैं।जिसके कारण ये काफी पीछे रह जाते हैं।झारखण्ड सरकार से इनकी यही आशा हैं कि सभी अनुभवी कलाकारों को सहयोग मिलें।अभी तक इनके काम के लिए कई सम्मान से सम्मानित भी हो चुके हैं।युवा कलाकारों से इनका यही कहना हैं कि अपने से अनुभवी कलाकारों का सम्मान करें।साथ ही गलत लोंगो के संपर्क में न रहें।

Wednesday, December 21, 2016

लड़कियों के प्रति लोगो को अपनी सोच बदलनी चाहिए:-जया पाण्डेय

""काम के लिए किसी के सामने नहीं झुके-जया पाण्डेय""मूलतः भागलपुर की रहने वाली जया पाण्डेय वर्तमान समय में बोकारो में रहती हैं।इनकी चर्चा इन दिनों खूब हो रही हैं।इसका कारण हैं,इनकी प्रतिभा।ये न ही फ़िल्मी परिवार से हैं और न ही किसी प्रकार की ट्रैनिंग लिए हैं।फिर भी इन्होंने आज अपने अभिनय से फिल्म और संगीत के क्षेत्र में एक मुकाम पाया हैं।अब तक इन्होंने कई म्यूजिक एल्बम और कुछ फिल्में की हैं।शुरुआत में कुछ भोजपुरी एल्बम कियें।जो टी-सीरीज से रिलीज़ किया गया।यूँ तो एक्टिंग में जया का शौक बचपन से ही रहा हैं।स्कूल कॉलेज के कार्यक्रमों में एंकरिंग भी किया करते थे।पढाई के साथ साथ समय बीतता गया।एक दिन जब इनकी मुलाकात डायरेक्टर पुनीत आनंद से हुई।तो पुनीत आनंद को लगा कि यह लड़की जरूर अभिनेत्री बन सकती हैं।इस तरह पहला म्यूजिक एल्बम का काम मिला।इसके बाद तो कई म्यूजिक एल्बम के लिए इन्होंने काम किया।शिवा म्यूजिक के लिए भी काफी काम किया हैं।इसके अलावे इन्होंने कुछ भोजपुरी फ़िल्म भी की हैं।उनमें से प्यार काबोहो न मिटी और गुड़वा में चीटियां लगबे करी जल्द ही रिलीज़ होने वाली हैं।और भी कुछ फिल्में हैं।जो आगे रिलीज़ होगी।इनका सपना और सोच कुछ अच्छा करने का हमेशा से रहा हैं।अपनी कामयाबी के लिए अपने माता पिता को धन्यवाद देते हैं।इनके आगे बढने में माता पिता का काफी साथ रहा।इनकी फिल्मे पूरी तरह साफ़ सुथरी फिल्मे हैं।ये हमेशा से ही अश्लीलता के खिलाफ रही हैं।आज कल कि युवा लड़कियों के लिए इनका सन्देश हैं कि कोई भी काम असंभव नही हैं।बस मेहनत करें।किसी के सामने नही झुके।

Tuesday, December 13, 2016

झारखण्ड सरकार के सहयोग से ही खोरठा भाषा का विकास हो सकता हैं-सतीश

""जब तक जीवन हैं संगीत से जुड़ा रहूँगा-सतीश""खोरठा संगीत की दुनिया में अपने सुपरहिट गीतों की बदौलत गायक सतीश पुरे झारखण्ड में प्रसिद्ध हैं।कोई खोरठा भाषी क्षेत्र ऐसा नहीं होगा।जो सतीश के गीतों में नहीं झुमा हो।इनके मधुर गीतों का जादू इस कदर फैला हुआ हैं कि आज भी हर जगह इनके गीत सुने जाते हैं।यूँ तो संगीत का शौक बचपन से ही रहा हैं।लेकिन,पापा के देहांत के बाद घर की स्तिथि काफी बिगड़ गयी।जिसके कारण घर परिवार की सारी जिम्मेदारी इन्हीं पर आ गयी।घर परिवार का खर्च चलाने के लिए दशवी के बाद से ही इन्होंने विभिन्न म्यूजिकल ग्रुप के साथ कार्यक्रम करने लगे।म्यूजिकल प्रोग्राम करते हुए।जब कई साल बीत गए।तो फिर इन्होंने संगीत की शिक्षा लेनी शुरू की।इनके संगीत गुरु एस डी बर्मन रहें हैं।इनसे कई वर्षों तक संगीत सीखते रहे।पर शादी के बाद थोड़ा व्यस्त होने के कारण संगीत की शिक्षा छोड़ दिए।लेकिन,इनके मन में आज भी सीखने की इच्छा हैं।संगीत शिक्षा के बाद कुछ म्यूजिक एल्बम बनाने की सोचे।पर सबसे बड़ी समस्या थी पैसे की।तो इन्होंने पैसे उधार लेकर अपना पहला ऑडियो कैसेट ऐ माई री बनाया।जो मैटी ऑडियो के द्वारा रिलीज़ किया गया।संयोगवश यह एल्बम मार्केट में नहीं चला।लेकिन,सतीश का मनोबल कम नहीं हुआ।आगे काम जारी रखतेे हुुए कई एल्बम बनाते रहे।पर सुपरहिट का सिलसिला तोर हमर जोड़ी से शुरू हुआ।जो लगातार जारी रहा।जैसे तोर दीवाना,प्यार के मोती,प्रेम सन्देश,प्रेम जोड़ी,मन्दाकिनी,रंगीला आदि इस तरह के कई एल्बम ऐसे हुए।जो काफी सुपरहिट रहें।इसके अलावे इन्होंने कई फिल्मों के लिए भी गीत गाये।जैसे झारखंडी हीरो,हमर देहाती बाबु आदि फिल्मों के लिए गाये।इस तरह से इन्होंने भी खोरठा गीत संगीत का एक ऐसा दौर जीया।जब इन्हें खोरठा गीत संगीत में दर्शकों ने सुपरस्टार का दर्जा दिया।फिर धीरे धीरे माहौल कुछ ऐसा हुआ कि खोरठा गीत संगीत का बाजार एक दम से कम हो गया।अगर कुछ काम भी हो रही हैं।तो वह ज़्यादा हिट नहीं हो पा रही हैं।इसका कारण कुछ ऐसा हैं कि उस समय सीडी कैसेट की बिक्री हुआ करती थी।जो बाजार में आसानी से मिल जाती थी।लेकिन आज का दौर पूरी तरह से ऑनलाइन डिजिटल मार्केट हो चूका हैं।जिसके पास एंड्रॉइड मोबाइल हैं।वही खोरठा भाषी खोरठा गीत संगीत सुन रहे हैं।अगर कुछ हिट क्षेत्रीय फ़िल्में बनती हैं।जो सुपरहिट हो।तभी हो सकता हैं खोरठा गीत संगीत का दौर वापस आये।सतीश ने अपनी कामयाबी का श्रेय अपनी माँ को दिया।इनका कहना हैं कि इनकी माँ ने हमेशा सतीश जी का साथ दिया हैं।कभी भी मनोबल कम नहीं होने दिया।युवा कलाकारों को इनका सन्देश हैं कि पूरी ईमानदारी के साथ काम करें।तभी सरकार और बिजनेसमैन मदद के लिए आगे आयेंगे।खोरठा गीत संगीत में इनके योगदान के लिए झारखण्ड सरकार और कई अन्य सम्मान से भी सम्मानित हो चुके हैं।

अभिनय सीखें फिर काम करें-रेहान खान

""आजकल सभी कलाकार तुरंत कामयाबी चाहते हैं-रेहान खान""रंगमंच की दुनिया से जुड़कर उभरे रेहान खान अपने अभिनय से काफी लोकप्रिय हुए हैं।इनकी छवि एक विलेन के रूप में ज़्यादा फैली हुई हैं।क्योंकि,इन्होंने ज़्यादा नेगेटिव किरदार ही किये हैं।चाहे नुक्कड़ नाटक हो,या कोई फिल्म सभी में इनका अधिकतर किरदार विलेन का ही रहा हैं।अभी इनका यूट्यूब में अपलोड वासेपुर इज बैक का गीत काफी चर्चा में हैं।इस वीडियो सांग में भी इन्होंने विलेन का ही किरदार किया हैं।जिसकी काफी प्रशंसा भी की जा रही हैं।इन्होंने अभिनय सीखने के लिए कला निकेतन ज्वाइन किया।आज भी जुड़े हुए ही हैं।आगे भी इनकी यही इच्छा हैं कि एक रंगकर्मी के रूप में काम करते रहे ।क्योंकि,इनका मानना हैं कि थिएटर के जरिये हम हमेशा ही कुछ न कुछ सीखते हैं।इन्होंने अब तक कई छोटे बड़े नाटक किये हैं।आगे भी करते ही रहेंगे।शुरू शुरू में जब इन्होंने अभिनय की शुरुआत की तो काफी परेशानी भी हुई।चूँकि,ये एक माध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते हैं।इस वजह से घर परिवार से काफी दबाव रहा हैं।लेकिन,धीरे धीरे सब ठीक ठाक हो गया।आज इन्हें सभी एक रंगकर्मी के रूप में जानने लगे हैं।इसके साथ ही कई काम भी मिलने लगे हैं।युवाओं से इनकी यही आशा हैं कि जलबाजी में कोई फैसला न ले।पहले सीखे और फिर काम करने की शुरुआत करें।

अभिनय मेरा करियर मेरा जूनून हैं-इश्तियाक अहमद

""कामयाबी मिलें या न मिलें अभिनय ही करेंगें-इस्तियाक अहमद""जेड इंटरप्राइजेज द्वारा घोषित फ़िल्म वासेपुर इज बैक के गीत से प्रसिद्ध हुए अभिनेता इश्तियाक अहमद आने वाले समय में एक अच्छे कलाकार साबित हो सकते हैं।यूट्यूब पर अपलोड इस गीत ने कुछ ही दिनों में हज़ारों लाखों लोगों तक अपनी पहुँच बना चुकी हैं।इश्तियाक ने अपने अभिनय की शुरुआत म्यूजिक एल्बम से ही की।शुरू शुरू में काफी असहजता के कारण कैमरा के सामने आते ही घबरा जाते थे।जिसके कारण इन्हें कई सांग्स एल्बम से बाहर कर दिया गया।लेकिन,इन्होंने हार नहीं मानी।इन्होंने अपनी कमी को दूर किया और जब फिर से कैमेरे के सामने आये। तो फिर सभी ने इनके काम की तारीफ की।इन्होंने जब म्यूजिक एल्बम की शुरुआत की थी।उसी समय कला निकेतन से जुड़ गए।जहाँ इन्होंने बशिष्ठ प्रसाद सिन्हा से अभिनय की बारीकियां को सीखे।कला निकेतन से जुड़ने के बाद कई छोटे बड़े नाटक किये।अभी तक 20 से ज़्यादा भोजपुरी एल्बम भी कर चुके हैं।कई फिल्म जैसे क्रांति,ज़िन्दगी के बिखरे सपने आदि में काम किये।कई शार्ट मूवीज में भी काम कर चुके हैं।इसके अलावे कई फिल्मों की शूटिंग जारी हैं।इश्तियाक अपनी कामयाबी का श्रेय अपने भाई जान सैय्यद नियाज को देते हैं।क्योंकि,बचपन से ही इनके भाई का काफी सहयोग रहा हैं।इनका मार्गदर्शन भी इन्होंने ही किया हैं।युवा कलाकारों से ये यही कहना चाहते हैं कि अभिनय में बहुत मेहनत करें क्योंकि,कामयाबी कब मिलेगी।इसकी कोई समय सीमा निश्चित नहीं हैं।

Monday, December 12, 2016

संगीत शिक्षक के तरह ही रंगमंच के भी शिक्षक होने चाहिए-बशिष्ठ प्रसाद सिंह

""झारखण्ड के कलाकारों को कोई सुविधा नहीं दी जाती हैं-वशिष्ठ प्रसाद सिन्हा""कला निकेतन प्रमुख व् अनुभवी रंगकर्मी वशिष्ठ प्रसाद सिन्हा झारखण्ड के बहुत ही प्रसिद्ध रंगकर्मी हैं।प्रारंभिक जीवन से ही इन्हें रंगकर्मी की शिक्षा दी गयी।चूँकि, इनके पिता भी एक रंगकर्मी ही रहें हैं।इस वजह से शुरू से एक माहौल मिला।इनकी रूचि लेखनी और अभिनय में ज़्यादा रही हैं।शुरुआत भी इस प्रकार हुई।1976-77 ई. पटना में बाढ़ आई हुई थी।उस पर आधारित एक गीत इनका रेडियो में प्रसारित हुआ था।इसके बाद 1981 ई. धनबाद में  इनका आगमन हुआ।यही रह कर अपनी पढ़ाई लिखाई पूरी करने के बाद अपने नेतृत्व में एक टीम का निर्माण किये।लेकिन,लोगों ने उस समय इनके काबिलियत को नहीं समझे।फिर भी इन्हें काम करने में ज़्यादा दिक्कत नहीं हुई।इनके पास थोड़ी बहुत जरूरते थी।जैसे कुछ कलाकार,लाइट और स्टेज।इन्होंने गाँव के कलाकारों के साथ ही थिएटर को विकसित करते गये।लेकिन,लोगो का विरोध भी सहना पड़ा।1981 ई. में ही एक नाटक अछूत कन्या का भूली के लोगो ने ही विरोध किया।जिसकी कहानी कुछ ऐसी थी।जो लोगो को पसंद नहीं आयी।पर,इन सब घटनाओं के बावजूद इनका मनोबल कम नहीं हुआ।इन्होंने 1981 ई. में ही समाज को बदल डालो एक नाटक लिखी।जिसका मंचन इन्होंने कुछ बुजुर्ग लोगो को जोड़कर किया।जो काफी सराहनीय रहा।लीगो ने इस नाटक की काफी प्रशंसा भी की।इस तरह से काम आगे बढ़ता रहा।फिर 3 दिसम्बर 1982 को कला निकेतन की शुरुआत हुई।जहाँ से लगभग लगभग सभी कलाकार सीखते हैं।धनबाद झारखण्ड में कला निकेतन इतना प्रसिद्ध हैं कि जो भी कलाकार रंगमंच से जुड़े हैं।उन्हें इस विषय में जानकारी हैं कि पूरे धनबाद में एक ही रंगमंच संस्था हैं।जो लगातार सक्रिय हैं और बेहतर काम भी कर रही हैं।1987 ई. में शादी के बाद पत्नी का काफी विरोध सहना पड़ा।चूँकि, नाटक में अपनी पुत्रियों को ला चुके थे।इस बात से इनकी पत्नी ज़्यादा नाराज थी।लेकिन,बाद में दाम्पत्य जीवन बचाने के लिए इनकी पत्नी भी रंगमंच से जुड़ गई।इनकी पत्नी ने सखाराम बाइंडर में चंपा की भूमिका निभाई।इस प्रकार इनका पूरा परिवार ही रंगकर्मी बन गए।इन सब कार्यो के सात साथ ये नौकरी भी करते थे।लेकिन,जब कुछ दिक्कतें आने लगी।तो,फिर 2006 में नौकरी छोड़कर पूरी तरह से रंगमंच के लिए ही काम करने लगे।इनके कार्यो के सम्मान में इन्हें राष्ट्रीय व् अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित भी किया जा चूका हैं।लेकिन,इस बात से काफी ज़्यादा खफ़ा हैं कि सरकार कलाकारों के लिए बहुत ही काम रही हैं।जबकि,होना बहुत कुछ चाहिए।हालाँकि,झारखण्ड कला सांस्कृतिक विभाग पहले से ज़्यादा जागरूक हुई हैं।युवा वर्ग को इनका सन्देश हैं कि जो भी कलाकार रंगकर्मी के रूप में उभारना चाहते हैं।वे सबसे पहले थिएटर सीखें।क्योंकि,बिना सीखें आप ज़ादा दूर नहीं जा सकते हो।

Saturday, December 10, 2016

खोरठा गीत संगीत का दौर फिर से आएगा:-कुमार दीपक

""झारखण्ड के कलाकारों में एकता व् आत्मविश्वास की कमी है:-कुमार दीपक""खोरठा गायक कुमार दीपक अपने गीत संगीत से लोगों का दिल जीते हैं।खोरठा गीत संगीत का एक दौर इन्होंने भी देखा हैं।जब इनके गाने काफी सुपरहिट हुए और आज भी कई मौकों पर इनके गीत सुने जाते हैं।शुरू-शुरू में जब खोरठा कैसेट्स उतने बनाये नहीं जाते थे।तब ही से इनके मन में खोरठा म्यूजिक एल्बम बनाने की चाहत रही हैं।खोरठा एल्बम फूलल फूलल रोटियां के रिलीज़ होने के बाद से ही कुमार दीपक भी सक्रिय हो गए।लेकिन,इनके मन में एक सवाल था कि आखिर गीत संगीत एल्बम किस प्रकार का बनाये।फिर एक दिन अपनी बहन के साथ बात करते करते दीपक को पता चला कि लोक गीत जो गाँव देहात में बुजुर्ग गाते हैं।वही एक गीत बन सकता हैं।पर,सबसे बड़ी समस्या थी पैसे की।क्योंकि,एक ऑडियो सीडी बनाने में कम से कम 20-25 हज़ार खर्च होते थे।तब दीपक ने एक छोटी सी सीडी कैसेटट्स की दुकान खोली।इसी दुकान की कमाई से थोड़ा थोड़ा बचाकर पैसे जमा किये।इस तरह से दीपक का पहला ऑडियो कैसेट नाय जो गे सोनिया बना।जिसका विडियो लवली म्यूजिक के द्वारा 2005 में बनाया गया।जो धनबाईदेक हीरो के नाम से रिलीज़ हुआ।लेकिन,सबसे सुपरहिट का सिलसिला 2012 में रिलीज़ धमाल से शुरू हुआ।इस म्यूजिक एल्बम से दीपक को एक पहचान मिली।इस म्यूजिक एल्बम को बनाने में हिन्द म्यूजिक सोनू सुदेश का काफी सहयोग रहा।इस समय एक अजब सी घटना हुई।जब दीपक हॉलसेलर को 15-20 कैसेटट्स देने के लिए आये।तो हॉलसेलर ने ऐसे ही रख लिया।लेकिन,जब दुबारा दीपक हॉलसेलर के पास गए।तब तो मानो दीपक को भरोसा ही न था कि यह एल्बम इतना चलेगा।उस समय उम्मीद से ज़्यादा इसका एल्बम हिट रहा।फिर 2013 में करम डाइर ,2014 में बांका रे बांका कुर्थी,जाने जिगर,2015 में हसीना और मोनालिसा आदि इस तरह से कई एल्बम आते रहे।जो काफी पसंद किए गए।2016 में अपनी पत्नी पूनम दास के साथ दीपक ने करमा नाचब संघी साथी रे बनाया।जो काफी हिट रहा।इस तरह आज भी दीपक लगातार गीत संगीत के प्रति सक्रीय हैं।खोरठा संगीत को मिलकर सभी आगे बढ़ाये इनका यही सन्देश हैं।क्योंकि,आज कई कलाकार हो गए हैं।लेकिन,सबका एक दूसरे के साथ संपर्क कम हुआ हैं।जिसके कारण हमारी लोक संस्कृति पिछड़ रही हैं।इनके कार्यो के सम्मान में दास परिवार की ओर से दीपक सम्मानित भी हो चुके हैं।फिर भी दीपक की इच्छा कुछ करने की हमेशा से रही हैं।